Friday, 12 October 2018

कुछ कर्ज कभी नही उतारे जा सकते

विवाह के दो वर्ष हुए थे जब सुहानी गर्भवती होने पर अपने घर पंजाब जा रही थी ...पति शहर से बाहर थे ...

जिस रिश्ते के भाई को स्टेशन से ट्रेन मे बिठाने को कहा था वो लेट होती ट्रेन की वजह से रुकने में मूड में नहीं था इसीलिए समान सहित प्लेटफॉर्म पर बनी बेंच पर बिठा कर चला गया ....

गाड़ी को पांचवे प्लेटफार्म पर आना था ...

गर्भवती सुहानी को सातवाँ माह चल रहा था. सामान अधिक होने से एक कुली से बात कर ली....

 बेहद दुबला पतला बुजुर्ग...पेट पालने की विवशता उसकी आँखों में थी ...एक याचना के साथ  सामान उठाने को आतुर ....

 सुहानी ने उसे पंद्रह रुपये में तय कर लिया और टेक लगा कर बैठ गई.... तकरीबन डेढ़ घंटे बाद गाडी आने की घोषणा हुई ...लेकिन वो बुजुर्ग कुली कहीं नहीं दिखा ...

कोई दूसरा कुली भी खाली नज़र नही आ रहा था.....ट्रेन छूटने पर वापस घर जाना भी संभव नही था ...

रात के साढ़े बारह बज चुके थे ..सुहानी का मन घबराने लगा ...

तभी वो बुजुर्ग दूर से भाग कर आता हुआ दिखाई दिया .... बोला चिंता न करो बिटिया हम चढ़ा देंगे गाडी में ...भागने से उसकी साँस फूल रही थी ..उसने लपक कर सामान उठाया ...और आने का इशारा किया

सीढ़ी चढ़ कर पुल से पार जाना था कयोकि अचानक ट्रेन ने प्लेटफार्म चेंज करा था जो अब नौ नम्बर पर आ रही थी

वो साँस फूलने से धीरे धीरे चल रहा था और सुहानी भी तेज चलने हालत में न थी
 गाडी ने सीटी दे दी
भाग कर अपना स्लीपर कोच का डब्बा ढूंढा ....

डिब्बा प्लेटफार्म खत्म होने के बाद इंजिन के पास था। वहां प्लेटफार्म की लाईट भी नहीं थी और वहां से चढ़ना भी बहुत मुश्किल था ....

सुहानी पलटकर उसे आते हुए देख ट्रेन मे चढ़ गई...तुरंत ट्रेन रेंगने लगी ...कुली अभी दौड़ ही रहा था ...

हिम्मत करके उसने एक एक सामान रेलगाड़ी के पायदान के पास रख दिया ।

अब आगे बिलकुल अन्धेरा था ..

जब तक सुहानी ने हडबडाये कांपते हाथों से दस का और पांच का का नोट निकाला ...
तब तक कुली की हथेली दूर हो चुकी थी...

उसकी दौड़ने की रफ़्तार तेज हुई ..
मगर साथ ही ट्रेन की रफ़्तार भी ....

वो बेबसी से उसकी दूर होती खाली हथेली देखती रही ...

और फिर उसका हाथ जोड़ना नमस्ते
और आशीर्वाद की मुद्रा में ....
उसकी गरीबी ...
उसका पेट ....
उसकी मेहनत ...
उसका सहयोग ...
सब एक साथ सुहानी की आँखों में कौंध गए ..

उस घटना के बाद सुहानी डिलीवरी के बाद दुबारा स्टेशन पर उस बुजुर्ग कुली को खोजती रही मगर वो कभी दुबारा नही मिला ...

आज वो जगह जगह दान आदि करती है मगर आज तक कोई भी दान वो कर्जा नहीं उतार पाया उस रात उस बुजुर्ग की कर्मठ हथेली ने किया था ...

सच है कुछ कर्ज कभी नही उतारे जा सकते......

गया में पिंडदान

गया में पिंडदान
बिहार की राजधानी पटना से करीब 104 किलोमीटर की दूरी पर बसा है गया । धार्मिक दृष्टि से गया , हिन्दूओं के लिए आदरणीय है। हिन्दू , गया को मुक्तिक्षेत्र और मोक्ष प्राप्ति का स्थान मानते हैं।इसलिए हर दिन देश के अलग-अलग भागों से नहीं बल्कि विदेशों में भी बसने वाले हिन्दू आकर गया में आकर अपने परिवार के मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध , तर्पण और पिण्डदान करते दिख जाते हैं।

गया में हर व्यक्ति क्यों चाहता है पिंडदान करना ? गया तीर्थ के बारे में गरूड़ पुराण में कहा गया है कि गया श्राद्ध करने मात्र से पितर यानी परिवार में जिनकी मृत्यु हो चुकी है वह संसार सागर से मुक्त होकर भगवान विष्णु की कृपा से उत्तम लोक में
जाते हैं। वायु पुराण में बताया गया है कि मीन , मेष , कन्या एवं कुंभ राशि में जब सूर्य होता है उस समय गया में पिण्ड दान करना बहुत ही उत्तम फलदायी होता है। इसी तरह मकर संक्रांति और ग्रहण के समय जो श्राद्ध और पिण्डदान किया जाता है वह श्राद्ध करने वाले और मृत व्यक्ति दोनों के लिए ही कल्याणी और उत्तम लोकों में स्थान दिलाने वाला होता है।गया तीर्थ के बारे में गरूड़ पुराण यह भी कहता है कि यहाँ पिण्डदान करने मात्र से व्यक्ति की सात पीढ़ी और एक सौ कुल का उद्धार हो जाता है। *गया तीर्थ के महत्व को भगवान राम ने भी स्वीकार किया है।**गया , में देवी सीता का शाप है ( जब सीता ने किया पिण्डदान )*वाल्मिकी रामायण में सीता द्वारा पिंडदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान राम लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुँचे। वहाँ श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए। उधर दोपहर हो गई थी। पिंडदान का समय निकलता जा रहा था और सीता जी की व्यग्रता बढती जा रही थी। अपराह्न में तभी दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की मांग कर दी। गया जी के आगे फल्गू नदी पर अकेली सीताजी असमंजस में पड गई। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष , केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे
दिया।थोडी देर में भगवान राम और लक्ष्मण लौटे तो उन्होंने कहा कि समय निकल जाने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया। बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता है , इसके लिए राम ने सीता से प्रमाण मांगा । तब सीता जी ने कहा कि यह फल्गू नदी की रेत , केतकी के फूल , गाय और वटवृक्ष मेरे द्वारा किए गए श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं । इतने में फल्गू नदी , गाय और केतकी के फूल तीनों इस बात से मुकर गए। सिर्फ वटवृक्ष ने सही बात कही। तब सीता जी ने दशरथ का ध्यान करके उनसे ही गवाही देने की प्रार्थना की।दशरथ जी ने सीताजी की प्रार्थना स्वीकार कर घोषणा की कि ऐन वक्त पर सीता ने ही मुझे पिंडदान दिया। इस पर राम आश्वस्त हुए लेकिन तीनों गवाहों द्वारा झूठ बोलने पर सीता जी ने उनको क्रोधित होकर श्राप दिया कि फल्गू नदी - जा तू सिर्फ नाम की नदी रहेगी , तुझमें पानी नहीं रहेगा। इस कारण फल्गू नदी आज भी गया में सूखी रहती है। गाय को श्राप दिया कि तू पूज्य होकर भी लोगों का जूठा खाएगी। और केतकी के फूल को श्राप दिया कि तुझे पूजा में कभी नहीं चढ़ाया जाएगा। वटवृक्ष को सीता जी का आर्शीवाद मिला कि उसे लंबी आयु प्राप्त होगी और वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री तेरा स्मरण करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करेगी। यही कारण है कि गाय को आज भी जूठा खाना पडता है , केतकी के फूल को पूजा पाठ में वर्जित रखा गया है और फल्गू नदी के तट पर सीताकुंड में पानी के अभाव में आज भी सिर्फ बालू या रेत से पिंडदान दिया जाता है.                         

Monday, 8 October 2018

एक दिन बहू ने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया

एक दिन बहू ने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया!!!

सफाई कर रही थी. मुंह में सुपारी थी. पीक आया तो वेदी में. पर उसे आश्चर्य हुआ कि उतना थूक स्वर्ण में बदल गया है.

अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी. और उसके पास धीरे धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा.
महिलाओं में बात तेजी से फैलती है. कई और महिलाएं भी अपने अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक थूक कर सोना उत्पादन करने लगी.

धीरे धीरे पूरे गांव में यह सामान्य चलन हो गया.
सिवाय एक महिला के.. !

उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया..!समझाया..!
“अरी. तू क्यों नहीँ थूकती?”
“जी. ! बात यह है कि मै अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हरगिज नहीँ करूंगी. और वे. जहाँ तक मुझे ज्ञात है.. अनुमति नहीँ देंगे!”

किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया.. कि आखिर उसने एक रात डरते डरते अपने ‎पति‬ को पूछ ही लिया.
“खबरदार जो ऐसा किया तो.. !! यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज है??”

पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस.. वह महिला चुप हो गई. पर जैसा वातावरण था. और जो चर्चाएं होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी.

खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियां अपने नए नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी.

पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते.
“यह शायद मेरा दुर्भाग्य है.. अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप.. कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ता है.”

“शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है.”
“ओह. इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है?”
“जिस नियम के पालन से ‎दिल‬ कष्ट पाता रहे. उसका पालन क्यों करूँ?”

और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी. ‎पतिदेव‬ इस रोग को ताड़ गए. उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया.

गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए. सूर्योदय से पहले पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे.

किन्तु..
अरे.. यह क्या..?????
ज्यों ही वे गांव की कांकड़(सीमा) से बाहर निकले.

पीछे भयानक विस्फोट हुआ.
पूरा गांव धू धू कर जल रहा था.
सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए.
और उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया.

वास्तव में.. इतने दिन गांव बचा रहा. तो केवल इस कारण..उसका परिवार गांव की परिधि में था।

धर्माचरण करते रहे... कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है... इसलिए लालच से बचें..

त्रिदेवो की परीक्षा


शिव का क्रोध

महर्षि भृगु ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम ख्याति था जो दक्ष की पुत्री थी। महर्षि भृगु सप्तर्षिमंडल के एक ऋषि हैं। सावन और भाद्रपद में वे भगवान सूर्य के रथ पर सवार रहते हैं।

एक बार की बात है, सरस्वती नदी के तट पर ऋषि-मुनि एकत्रित होकर इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु में सबसे बड़े और श्रेष्ठ कौन है? इसका कोई निष्कर्ष न निकलता देख उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को इस कार्य के लिए नियुक्त किया।

महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने न तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। क्रोध की अधिकता से उनका मुख लाल हो गया। आँखों में अंगारे दहकने लगे। लेकिन फिर यह सोचकर कि ये उनके पुत्र हैं, उन्होंने हृदय में उठे क्रोध के आवेग को विवेक-बुद्धि में दबा लिया।

वहाँ से महर्षि भृगु कैलाश गए। देवाधिदेव भगवान महादेव ने देखा कि भृगु आ रहे हैं तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका आलिंगन करने के लिए भुजाएँ फैला दीं। किंतु उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए बोले-“महादेव! आप सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं, उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है। इसलिए मैं आपका आलिंगन कदापि नहीं करूँगा।”

उनकी बात सुनकर भगवान शिव क्रोध से तिलमिला उठे। उन्होंने जैसे ही त्रिशूल उठा कर उन्हें मारना चाहा, वैसे ही भगवती सती ने बहुत अनुनय-विनय कर किसी प्रकार से उनका क्रोध शांत किया। इसके बाद भृगु मुनि वैकुण्ठ लोक गए। उस समय भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी की गोद में सिर रखकर लेटे थे।

भृगु ने जाते ही उनके वक्ष पर एक तेज लात मारी। भक्त-वत्सल भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके उनके चरण सहलाते हुए बोले-“भगवन! आपके पैर पर चोट तो नहीं लगी? कृपया इस आसन पर विश्राम कीजिए। भगवन! मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान न था। इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका। आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है। आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया।”

भगवान विष्णु का यह प्रेम-व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आँखों से आँसू बहने लगे। उसके बाद वे ऋषि-मुनियों के पास लौट आए और ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु के यहाँ के सभी अनुभव विस्तार से कह बताया। उनके अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनि बड़े हैरान हुए और उनके सभी संदेह दूर हो गए। तभी से वे भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे।

वास्तव में उन ऋषि-मुनियों ने अपने लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों के संदेहों को मिटाने के लिए ही ऐसी लीला रची थी।

Sunday, 7 October 2018

चिड़िया का ज्ञान


राजा भानुप्रताप के विशाल महल में एक सुंदर वाटिका थी, जिसमें अंगूरों की एक बेल लगी थी, वहां रोज एक चिड़िया आती, मीठे अंगूर चुनकर खा जाती और अधपके व खट्टे अंगूरों को नीचे गिरा देती, माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की पर वह हाथ नहीं आयी, हताश होकर एक दिन माली ने राजा को यह बात बताई, यह सुनकर राजा को आश्चर्य हुआ, उसने सोचा इस चिड़िया को वह खुद पकड़ेगा और उसे सबक सिखाएगा, अगले दिन राजा वाटिका में छिपकर बैठ गया, जब चिड़िया आयी तो राजा ने उसे पकड़ लिया, वह चिड़िया की गर्दन मरोड़ने ही वाला था कि चिड़िया बोली-राजन, मैं आपको ज्ञान की चार महत्वपूर्ण बातें बताऊंगी, राजा ने कहा जल्दी बता, चिड़िया बोली- *पहली बात ये की हाथ में आये शत्रु को कभी मत छोड़ो*, राजा ने कहा-दूसरी बात....? चिड़िया ने कहा- *किसी असम्भव बात पर भूलकर भी विश्वास मत करो,* तीसरी बात यह कि *बीती बातों पर कभी पश्चाताप मत करो,* राजा ने कहा- अब चौथी बात भी जल्दी बतादो, इसपर चिड़िया बोली, चौथी बात बड़ी रहस्यमयी है, मेरी गर्दन थोड़ी ढ़ीली करें क्योंकि मेरा दम घुट रहा है, कुछ सांस लेकर ही बता सकूंगी, चिड़िया की बात सुन राजा ने जैसे ही अपना हाथ ढीला किया, चिड़िया उड़कर एक डाल पर बैठ गई, राजा भौंचक्का सा उसे देख रहा था, चिड़िया बोली- हे राजन, *चौथी बात यह है कि ज्ञान की बात सुनने से कुछ लाभ नहीं होता उसपर अमल करने से होता है,* अगर आप मेरी पहली बात पर अमल किए होते तो आज मै आपके गिरफ्त मे होती। मैं आपकी शत्रु थी, फिर भी मुझे पकड़ने के बाद आप मेरी अच्छी-अच्छी बातों के बहकावे में आ गए और मुझे ढीला छोड दिया, अब तो आप अपनी गलती पर बस पछता सकते हैं, इतना कहकर चिड़िया उड़ गई और राजा ठगे से खड़े रह गए।

Monday, 1 October 2018

इच्छाशक्ति


हिरण के दौड़ ने की गति लगभग 85 किमी प्रति घंटा की होती है जबकि शेर कि गति ज्यादा से ज्यादा 60 किमी प्रति घंटा है। गति में इतने अंतर होने के बावजूद भी अधिकतम अवसरों पर हिरण शेर का शिकार बन जाता है। जानते हैं क्यों?

क्योंकि जब भी शेर को देखकर जान बचाने के लिए हिरण भागता है तो उसे ये पक्का विश्वास हो जाता है कि शेर उसे अब हरगिज नहीं छोड़ेगा वह शेर के सामने कमजोर और असहाय है और उससे बच कर नहीं निकल सकता।

छुटकारा न पा सकने का ये डर उसे हर पल पीछे मुड़कर ये देखने के लिए विवश कर देता है कि अब उसके और शेर के बीच कितनी दूरी बची है। और डर की स्थिति में यही सोच हिरण की गति को प्रभावित करती है और इसी बीच में शेर नजदीक आकर उसे दबोचकर अपना निवाला बना लेता है।

अगर हिरण पीछे मुड़कर देखने की अपनी इस आदत पर काबू पा ले तो कभी भी शेर का शिकार नहीं बन पाएगा। और अगर हिरण को अपनी क्षमता पर विश्वास हो जाए कि उसकी शक्ति उसकी तेज़ गति में छुपी हुई है बिल्कुल ऐसे ही जैसे शेर की शक्ति उसकी पाचन और आत्मविश्वास में छुपी हुई है तो वह हमेशा शेर से बच जाएगा।

बस कुछ ऐसी ही हम इंसानों प्रकृति बन जाती है कि हम हर पल पीछे मुड़ मुड़कर अपने भूतकाल को तकते और कुरेदते रहते हैं। जो कुछ और नहीं बल्कि हमें डंसता रहता है, हमारी हिम्मतों को कमजोर करता रहता है और हमारे व्यवहार को नीरस बनाता रहता है। और कितने ही ऐसे पीछा करते हमारे वहम और डर हैं जो हमें नाकामियों का निवाला बनाते रहते हैं।

और कितनी ही हमारी ऐसी आंतरिक निराशाएं हैं जो हमसे जिंदा रहने का हौसला तक छीनती रहती हैं। हम कहीं खत्म न हो जाएं की सोच की वजह से अपने लक्ष्य को प्राप्त के योग्य नहीं बनते और न ही अपनी क्षमताओं पर कभी विश्वास कर पाते हैं।

प्रसन्नता का कारण



देवदास बड़ा हैरान था कि गुरु शृणोति, प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न कैसे रह लेते हैं। उसका अध्ययन करने के लिये वह कई दिन तक निरन्तर शृणोति के साथ बना रहा।

मध्याह्न का भोजन कर चुकने के पश्चात् मुनि शृणोति ने अपनी धर्मपत्नी शोभा से कहा- "घर में गुड़ हो तो एक डली देना। गुड़ में छार होता है उससे पेट साफ हो जाता है।"

शोभा ने इधर-उधर ढूँढ़ा, घर में गुड़ था नहीं सो लौटकर बताया- "गुड़ रहा नहीं, कहें तो मँगा दूँ।"
शृणोति ने मुस्कराते हुए कहा- "नहीं, नहीं, प्रिये! उसकी आवश्यकता नहीं। गुड़ तो गरम करता हैं?"

देवदास ने पूछा- "महात्मन् पहले तो आपने उसी गुड़ को उपयोगी ठहराया बाद में हानिकारक! आप भी दोहरी बातें करते हैं।”

शृणोति ने कहा- "वत्स यह विनोदप्रियता ही सदैव प्रसन्नता का रहस्य है और संसार में कुछ है नहीं। यहाँ न कुछ उपयोगी है न अनुपयोगी, मान्यताओं के अनुपम वस्तुओं की उपयोगिता-अनुपयोगिता बदलती रहती है।"

'अखण्ड ज्योति,जुलाई