Sunday, 13 September 2020

पिता की प्रार्थना

           एक बार पिता और पुत्र जलमार्ग से यात्रा कर रहे थे, और दोनों रास्ता भटक गये। फिर उनकी नौका भी उन्हें ऐसी जगह ले गई, जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई। 

          पिता ने पुत्र से कहा, "अब लगता है, हम दोनों का अंतिम समय आ गया है, दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है।"

          अचानक पिता को एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि "वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है, तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें।" 

          उन्होने दोनों टापू आपस में बाँट लिए। एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

          पुत्र ने ईश्वर से कहा, 'हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।' ईश्वर ने प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया। 

          फिर उसने प्रार्थना की, एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ। तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी। अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे लूँ ? 

          उसने ऐसा ही किया। उसने प्रार्थना की, एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ। तत्काल नाव प्रकट हुई, और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा। तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?

          पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो, प्रार्थना तो उनने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी।  शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना ?

          आकाशवाणी ने कहा, 'क्या तुम्हें पता है, कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?

          पुत्र बोला, नहीं।

          आकाशवाणी बोली तो सुनो, 'तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की, हे भगवन! मेरा बेटा आपसे जो माँगे, उसे दे देना। और जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।'

          हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं। और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर पछताना पड़ता है।


                       मातृपितृ चरणकमलोभ्यः नमः

यह किसी और ने मेरे पास भेजा था।

Thursday, 5 March 2020

अपमान का घाव/ Insult wound



प्राचीन समय की बात है एक ब्राह्मण था। वह अपने जीवन से बड़ा दुखी रहा करता था। घर में कुछ खाने को नहीं था। स्वयं को खाने के लिए कुछ था ही नहीं तो दूसरों को क्या खिलाता? नातेदार-रिश्तेदार भी उसी की इज्जत करते हैं जो व्यक्ति धनवान होता है। इन सब चीजों से दुखी होकर ब्राह्मण ने कहीं दूर भाग जाने या किसी नरभक्षी पशु का आहार बन जाने की सोची। इसी सोच में डूबा हुआ वह घने जंगल की ओर निकल गया।

शाम होने को आई। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसने सोचा कि अभी कोई हिंसक पशु आएगा जो अपनी भूख मिटाने के साथ मेरी जीवन-लीला खत्म करके सारे क्लेश भी दूर कर देगा।

उसी समय उसने देखा कि सामने एक गुफा में से शेर निकला। शेर कुछ रूका। पेड़ पर उसका मंत्री हंस बैठा था जो अपनी बुद्धि, अपने शील-स्वभाव और दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए जग-प्रसिद्ध है।
शेर ने कहा- दीवानजी! आज तो शिकार स्वयं ही सामने आ गया।

हंस ने ब्राह्मण को देखा और सोचने लगा, पता नहीं यह कौन दुखी आदमी है। शेर ने कितने ही जीव मार डाले, आज इस ब्राह्मण को क्यों न बचाऊं? फिर शेर से बोला-मृगराज! यह ब्राह्मण आपका कुल पुरोहित है, आपको ढूंढ़ता-ढूंढ़ता यहां आया है। आपके पूर्वज इनका बड़ा सत्कार करते थे। जाओ, देखते क्या हो, प्रणाम करो। देखना उसे कोई कष्ट न हो। उलटे कुछ संपत्ति दो। क्या याद करेगा कि आपके पास आया था।

शेर भी अपने मंत्री की बात मानता था। झट से गया और ब्राह्मण के पैर छुए और उसे गुफा में ले आया। शेर ने उसकी आवभगत की और फिर एक जगह दिखा दी जहां से ब्राह्मण ने धरती खोदकर दौलत पाई और शेर से अनुमति ले घर लौट आया।

धन-दौलत मिल जाने से ब्राह्मण का दुख-दरिद्र जाता रहा। अब उसका रहन-सहन भी अच्छा हो गया। घर में पशुधन, धन-धान्य आ गया। अब वह प्राय: शेर के पास जाता और हर बार कुछ-न-कुछ ले आता। इस प्रकार वह काफी अमीर हो गया।

एक दिन ब्राह्मण की स्त्री ने कहा-तुम रोज कहते हो कि हमारा नया यजमान बहुत अच्छा है, कभी उसे अपने घर तो बुलाते। इस महीने यजमान गुरु के घर का अन्न खाते हैं, तुम भी उसे निमंत्रण दो। बात ब्राह्मण को जंच गई और वह शेर के पास गया और उसे खाने का न्योता दिया।

शेर ने कहा-रहने दो, हम हुए जंगली जानवर। रात अंधेरे में ही आ सकते हैं। तुम्हें बड़ी असुविधा होगी।

पर ब्राह्मण ने आग्रह किया और शेर ने उसके घर जाना स्वीकार कर लिया। एक दिन ब्राह्मण शेर को अपने साथ ले आया। उसने अपने इस विचित्र यजमान की बड़ी कदर की, पर नई-नई सम्पत्ति पाकर ब्राह्मण की स्त्री को बड़ा गर्व हो गया था। उसने बहुत से पकवान बनाए थे। जब उसने शेर को देखा तो पहले डरी, फिर कुछ घबराई और उसे कुछ सुझाई न दिया कि क्या करे।

ब्राह्मण ने समझाया कि ये कुछ नहीं कहेगा, डरो मत। इसी की कृपा से हमारे दिन फिरे हैं।

जब वे भाजन के लिए बैठे तो ब्राह्मणी ने अपनी नाक कपड़े से बन्द कर ली। उसे शेर से बहुत दुर्गंध आ रही थी। जब खा चुके तो उसने कहा-अच्छा है तुम्हारा यजमान। मुंह से वह दुर्गंध आ रही थी कि मेरी नाक भी सड़ गई। शेर ने यह बात सुन ली और धीरे से जंगल को निकल गया। कुछ दिन बाद ब्राह्मण फिर शेर के पास गया तो देखा, शेर के तेवर बदले हुए थे। शेर ने कहा-पुरोहित जी। यह लो खड्ग और मारो मेरे सिर पर।

ब्राह्मण ने कहा-क्या बात है महाराज। आज आप कैसी बातें कर रहे हैं।
शेर बोला-नहीं, आज तुम्हें खड्ग का वार करना ही पड़ेगा।
ब्राह्मण ने कहा-नहीं, यह काम मुझसे नहीं होगा।
शेर गरजा-देखता हूं तुम कैसे नहीं करोगे।

ब्राह्मण डर गया और उसने खड्ग उठाया और धीरे से शेर के सिर पर लगा दिया। धार तेज थी, कुछ खून बह निकला। ब्राह्मण हैरान हुआ अपने घर लौट आया।

कई दिन बीत गए। ब्राह्मण डर के मारे उधर न जाता। वह समझा कि शेर पागल हो गया है, पता नहीं अब उसका क्या हाल होगा और अगर मैं गया भी तो न मालूम इस बार क्या कहे।

उधर शेर के मंत्री हंस को किसी शिकारी ने मार डाला। शेर ने कौए को नया मंत्री बनाया। कौए ने अपनी मति के अनुसार शेर को सलाह दी और अपने ढंग पर उसे चलाया।

कई महीने बीत गए, ब्राह्मण को फिर धन की आवश्यकता हुई। उसने पुन: शेर के पास जाने की सोची और एक दिन वह जंगल की ओर गया।

शेर की गुफा के बाहर पास के पेड़ पर कौआ बैठा था। उसने जोर से कांव-कांव करना शुरू किया और इस प्रकार शेर को सूचित किया कि शीघ्रता करो, शिकार फंसा है। शेर ने बाहर आकर देखा उसका अपना पुराहित है। उसे हंसी आ गई।
ऐसे ही एक दिन हंस ने भी उसके आने की सूचना दी थी।

ब्राह्मण को शेर के पास बिना संकोच बैठे और बातें करते देख कौए को बड़ा आश्चर्य हुआ, वह तो उसके मारे जाने की ताक में था। शेर ने ताड़ लिया और ब्राह्मण से कहा-देखो भला, मेरे सिर पर जो तुमने प्रहार किया था, उसका क्या हाल है?
ब्राह्मण ने देखा और कहा-महाराज! वह तो अब पूरी तरह भर गया है, अब ठीक है।

शेर ने कहा-खड्ग का घाव ठीक हो गया, परन्तु जो कुछ तुम्हारी पत्नी ने मेरा अपमान किया था, उसका जख्म अभी भी हरा है। वह नहीं भरा।

ब्राह्मण के तो जैसे पांव के नीचे की मिट्टी निकल गई, वह चुप हो गया। शेर ने
कहा-डरो नहीं, असल में यह है:-

हंसा थे सो चल बसे, काग बने दीवान।
जाओ ब्राह्मण घर अपने, शेर किसका यजमान?

पता नहीं यह कौआ क्या पाप करा दे, अब तुम यहां मत आना। ब्राह्मण ने सोचा जान बची लाखों पाए।
फिर उसे आवश्यकता हुई तो भी उसने मुंह उधर न किया।

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Sunday, 29 September 2019

प्रथम देवी शैलपुत्री का महात्म्य और श्लोक



नवरात्रि में दुर्गा पूजा के दौरान सबसे पहले शैलपुत्री की ही उपासना की जाती है। हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण वह शैलपुत्री हुईं। वृषभ शैलपुत्री का वाहन है, इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। शैलपुत्री को प्रथम दुर्गा कहा जाता है और सती के नाम से भी जानी जाती हैं।

उनकी एक मार्मिक कहानी है। एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया पर भगवान शंकर को नहीं। सती यज्ञ में जाने के लिए व्याकुल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो उनके पिता दक्ष ने उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दारुण दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया।


यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शिव से हुआ। इनका महत्व और शक्ति अनंत है। पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं।

मां दुर्गा अपने प्रथम स्वरूप में शैलपुत्री के रूप में जानी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण इन्हें शैल पुत्री कहा गया। भगवती का वाहन बैल है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। अपने पूर्व जन्म में यह सती नाम से प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। नव दुर्गाओं में शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनन्त हैं। नवरात्र के दौरान प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा व उपासना की जाती है। ध्यान

वंदे वांच्छितलाभायाचंद्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढांशूलधरांशैलपुत्रीयशस्विनीम्घ्

पूर्णेदुनिभांगौरी मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा।

पटांबरपरिधानांरत्नकिरीटांनानालंकारभूषिताघ्

प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांतकपोलांतुंग कुचाम्।

कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितंबनीम्घ् स्तोत्र

प्रथम दुर्गा त्वहिभवसागर तारणीम।

धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम

त्रिलोकजननींत्वंहिपरमानंद प्रदीयनाम।

सौभाग्यारोग्यदायनीशैलपुत्रीप्रणमाभ्यहमघ्

चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन।

भुक्ति, मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहमघ्

चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन।

भुक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहमघ् कवच

ओमकार में शिरपातुमूलाधार निवासिनी।

हींकार,पातुललाटेबीजरूपामहेश्वरीघ्

श्रीकाररूपातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी।

हूंकाररूपातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृतघ्

फट्काररूपातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा।

इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है। दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके। उपासना मंत्र

वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम।।

Friday, 2 August 2019

मैं न होता तो क्या होता


अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये। वे सोचने लगे। यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता???

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है,  मै न होता तो क्या होता ? परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है। अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा।

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।

आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...
 मै न होता तो क्या होता

Thursday, 27 June 2019

योग और योगासन

योग क्या है:- 

योग हमारे जीवन से जुड़े भौतिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक और आध्यात्मिक, आदि सभी पहलुओं पर काम करता है। योग का अर्थ एकता या बांधना है। इस शब्द की जड़ है संस्कृत शब्द युज, जिसका मतलब है जुड़ना। आध्यात्मिक स्तर पर इस जुड़ने का अर्थ है सार्वभौमिक चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना का एक होना। व्यावहारिक स्तर पर, योग शरीर, मन और भावनाओं को संतुलित करने और तालमेल बनाने का एक साधन है। 
    योग आसन,  प्राणायाम, मुद्रा, बँध, षट्कर्म और ध्यान के अभ्यास के माध्यम से प्राप्त होती है। योग जीने का एक तरीका भी है और अपने आप में परम उद्देश्य भी।

योग के लाभ:-

शारीरिक और मानसिक उपचार योग के सबसे अधिक ज्ञात लाभों में से एक है।
योग अस्थमा, मधुमेह, रक्तचाप, गठिया, पाचन विकार और अन्य बीमारियों में चिकित्सा के एक सफल विकल्प है। 
       चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार, योग चिकित्सा तंत्रिका और अंतःस्रावी तंत्र में बनाए गए संतुलन के कारण सफल होती है जो शरीर के अन्य सभी प्रणालियों और अंगों को सीधे प्रभावित करती है। 
अधिकांश लोगों के लिए, हालांकि, योग केवल तनावपूर्ण समाज में स्वास्थ्य बनाए रखने का मुख्य साधन हैं। इनके अलावा योग के कई आध्यात्मिक लाभ भी हैं। इनका विवरण करना आसान नहीं है, क्योंकि यह आपको स्वयं योग अभ्यास करके हासिल और फिर महसूस करने पड़ेंगे।

योग के नियम:-

अगर आप यह कुछ सरल नियमों का पालन करेंगे, तो अवश्य योग अभ्यास का पूरा लाभ पाएँगे:

  • 1) सूर्योदय या सूर्यास्त के वक़्त योग का सही समय है।

  • 2) योग खाली पेट करें। योग करने से 2 घंटे पहले कुछ ना खायें।

  • 3) आरामदायक कपड़े पहनें।
4) शांत वातावरण और सॉफ जगह में योग अभ्यास करें।
  • 5) योग अभ्यास धैर्य और दृढ़ता से करें।
6) अपने शरीर के साथ ज़बरदस्ती बिल्कुल ना करें।
  • 7) योग करने के 30 मिनिट बाद तक कुछ ना खायें। 1 घंटे तक न नहायें।
8) प्राणायाम हमेशा आसन अभ्यास करने के बाद करें।
  • 9) योगाभ्यास के अंत में हमेशा शवासन करें।

योग के प्रकार:- 

योग के 4 प्रमुख प्रकार हैं:- 

1) राज योग: 
  • राज का अर्थ शाही है और योग की इस शाखा का सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग है ध्यान। इस योग के आठ अंग है, जिस कारण से पतंजलि ने इसका नाम रखा था अष्टांग योग। इसे योग सूत्र में पतंजलि ने उल्लिखित किया है। यह 8 अंग इस प्रकार है: 
  • 1) यम (शपथ लेना), 
  • 2) नियम (आचरण का नियम या आत्म-अनुशासन),
  • 3) आसन,
  • 4) प्राणायाम (श्वास नियंत्रण),
  • 5) प्रत्याहार (इंद्रियों का नियंत्रण),
  • 6) धारण (एकाग्रता),
  • 7) ध्यान (मेडिटेशन),
  • 8)  समाधि (परमानंद या अंतिम मुक्ति)
  •   राज योग आत्मविवेक और ध्यान करने के लिए तैयार व्यक्तियों को आकर्षित करता है। आसन राज योग का सबसे प्रसिद्ध अंग है, यहाँ तक कि अधिकतर लोगों के लिए योग का अर्थ ही है आसन। 

  • कर्म योग: 
     कर्म योग का सिद्धांत यह है कि जो आज हम अनुभव करते हैं वह हमारे कार्यों द्वारा अतीत में बनाया गया है। इस बारे में जागरूक होने से हम वर्तमान को अच्छा भविष्य बनाने का एक रास्ता बना सकते हैं,  जब भी हम अपना काम करते हैं और अपना जीवन निस्वार्थ रूप में जीते हैं और दूसरों की सेवा करते हैं, हम कर्म योग करते हैं। 
     
  • भक्ति योग:
    भक्ति योग भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है। सभी के लिए सृष्टि में परमात्मा को देखकर, भक्ति योग भावनाओं को नियंत्रित करने का एक सकारात्मक तरीका है। भक्ति का मार्ग हमें सभी के लिए स्वीकार्यता और सहिष्णुता पैदा करने का अवसर प्रदान करता है। 
     
  • ज्ञान योग:
    अगर हम भक्ति को मन का योग मानते हैं, तो ज्ञान योग बुद्धि का योग है, ऋषि या विद्वान का मार्ग है। इस पथ पर चलने के लिए योग के ग्रंथों और ग्रंथों के अध्ययन के माध्यम से बुद्धि के विकास की आवश्यकता होती है। ज्ञान योग को सबसे कठिन माना जाता है और साथ ही साथ सबसे प्रत्यक्ष। इसमें गंभीर अध्ययन करना होता है और उन लोगों को आकर्षित करता है जो बौद्धिक रूप से इच्छुक हैं।

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Tuesday, 4 June 2019

सांस लेने का सही तरीका


अगर आप सही सांस लेते हैं तो आपका "प्राणमय कोष" स्वस्थ, अखंड और प्राणवान रहता है।


इस तरह का व्यक्ति कभी नहीं थकता। इस तरह का व्यक्ति हमेशा कुछ भी करने के लिए उपलब्ध है। इस तरह का व्यक्ति हमेशा उत्तरदायी, हमेशा क्षण को प्रतिसंवेदित करने के लिए, चुनौती लेने के लिए तैयार है। वह हमेशा तैयार है, आप उसे किसी भी पल के लिए अप्रस्तुत नहीं पाएंगे। ऐसा नहीं है कि वह भविष्य के लिए योजना बनाता है, लेकिन उसके पास इतनी ऊर्जा है कि जो भी होता है उसका प्रतिसंवेदन करने के लिए वह तैयार है। उसके पास "छलकती हुई ऊर्जा" है।


प्राकृतिक सांस लेने को समझना जरूरी है। देखो छोटे बच्चों को, वे स्वाभाविक रूप से सांस लेते हैं। यही कारण है कि छोटे बच्चे ऊर्जा से भरे हुए होते हैं। माता-पिता थक गए हैं, लेकिन वे थके नहीं हैं।


कहां से ऊर्जा आती है? यह प्राणमय कोष से आती है। बच्चा स्वाभाविक रूप से सांस लेता है, और निश्चित रूप से अधिक प्राण और अधिक "ची- ऊर्जा" सांस के द्वारा लेता है, और यह उसके पेट में जमा होती है। पेट इकट्ठा करने की जगह है, भंडार है। बच्चे को देखो, वह सांस लेने का सही तरीका है। जब एक बच्चा सांस लेता है, उसकी छाती पूरी तरह से अप्रभावित होती है। उसका पेट ऊपर और नीचे होता है। मानो वह पेट से सांस ले रहा है। सभी बच्चों का पेट निकला होता है, वह उनके पेट से सांस लेने की वजह से है और वह ऊर्जा का भंडार है।


यह सांस लेने का सही तरीका है, ध्यान रहे, अपनी छाती का बहुत ज्यादा उपयोग नहीं करना है। कभी-कभी यह आपातकालीन समय में किया जा सकता है। आप अपने जीवन को बचाने के लिए दौड़ रहे हैं, तब छाती का उपयोग किया जा सकता है। यह एक आपातकालीन उपाय है। तो आप उथले, तेजी से सांस लेने का उपयोग कर सकते हैं और दौड़ सकते हैं। लेकिन आमतौर पर छाती का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। और एक बात याद रखनी जरूरी है कि छाती आपात स्थितियों के लिए ही होती है क्योंकि आपात स्थिति में स्वाभाविक रूप से सांस लेना मुश्किल है; क्योंकि अगर आप स्वाभाविक रूप से सांस लेते हैं तो आप इतने शांत और मौन होते हो कि आप दौड़ नहीं सकते, आप लड़ नहीं सकते। आप इतने शांत और केंद्रित होते हैं--एकदम बुद्ध जैसे। और एक आपात स्थिति में--जैसे घर में आग लगी है--यदि आप स्वाभाविक रूप से सांस लेंगे तो आप कुछ भी बचा नहीं पाएंगे। या जंगल में एक बाघ आप पर कूदता है और आप स्वाभाविक रूप से सांस लेते रहें तो आप फिक्र ही नहीं करेंगे। आप कहेंगे, 'ठीक है, उसे करने दो जो भी वह चाहता है।' आप अपने खुद को बचाने के लिए सक्षम नहीं होंगे।

तो प्रकृति ने एक आपातकालीन उपकरण दिया है, छाती एक आपातकालीन उपाय है। जब आप पर एक बाघ हमला करता है, तो आपको प्राकृतिक सांस छोड़ देनी होती है और आप को छाती से सांस लेनी होती है। तब दौड़ने के लिए , लड़ने के लिए, ऊर्जा को तेजी से जलाने के लिए आपके पास अधिक क्षमता होगी। और आपात स्थिति में केवल दो ही विकल्प होते हैं: भाग जाना या लड़ाई करना। दोनों के लिए बहुत उथली लेकिन तीव्र ऊर्जा की जरूरत है, उथली लेकिन एक बहुत परेशान, तनावग्रस्त स्थिति।


अगर आप लगातार सीने से सांस लेते हैं तो, आपके मन में तनाव होगा। अगर आप लगातार सीने से सांस लेते हैं, आप हमेशा भयभीत होंगे क्योंकि सीने से सांस लेना खतरनाक परिस्थितियों के लिए ही होता है। और यदि आपने इसे एक आदत बनाया है तो आप लगातार भयभीत, तनावग्रस्त, हमेशा भागने की तैयारी में होंगे। वहां दुश्मन नहीं है, लेकिन आप दुश्मनों की कल्पना करेंगे। इसी तरह " पैरानोया, व्यामोह" निर्मित होता है।


'एक बच्चे को देखें और वही प्राकृतिक सांस है, और उसी तरह सांस लें । जब आप सांस लें तब पेट ऊपर आए और जब आप सांस छोड़े तब पेट नीचे जाए। और यह एक ऐसी लय हो कि यह आपकी ऊर्जा में लगभग एक गीत बन जाता है, एक नृत्य ताल के साथ, सामंजस्य के साथ--और आप इतने निश्चिंत महसूस करेंगे, इतने जीवंत, जीवन-शक्ति से ओतप्रोत कि आप कल्पना नहीं  कर सकते कि ऐसी जीवन-शक्ति हो सकती है।'


 योगा: दि पाथ ऑफ लिबरेशन

Saturday, 1 June 2019

याद कर लो

चले थे साथ मिलकर हम कभी 
तुम वो जमाना याद कर लो 
बिछड़ गए हैं हम अभी 
पर तुम वो जमाना याद कर लो 
हाथो में लेकर हाथ 
बातें करते थे सारी रात 
न जाने कहाँ चली गयी वो शाम 
एक बार फिर वो शाम याद कर लो 
फिर आ जाओ मेरे पास 
रंगीन कर दो मेरी सुबह और शाम 
अपनी बाहों में भर के मुझे 
मेरे शरीर में जीवन का संचार कर दो 
चली गयी हो जब से बेजान हो गया हूँ 
तेरी राह तकते -तकते चट्टान हो गया हूँ 
आकर पास मेरे मुझे अपना बना लो 
विक्रान्त टूट जाये इससे पहले इसे अपना बना लो।