Wednesday, 19 January 2022

आज का दिन है बहुत खास मेरा

आज का दिन है बहुत खास मेरा,
इस दिन ही मैंने कुछ पाया है,
न जाने कब से उससे बिछड़ा था,
आज के दिन ही उसको पाया है,
जिसकी तलाश में वर्षो से,
मैं भटक रहा था यूँ दर-दर,
पा गया उसे एक लम्हे में,
सोचा न था वो मिलेगी इस कदर,
आज का दिन है बहुत खास मेरा,
इस दिन ही मैंने कुछ पाया है।
मिलना भी हुआ बहुत खास मेरा,
जीवन हो गया मेरा पूरा,
तब से हर लम्हा याद में उसकी,
विक्रान्त अपना समय बिताता है,
आ जायेगी जल्दी पास उसके,
यही सोच- सोच इठलाता है,
आज का दिन है बहुत खास मेरा,
इस दिन ही मैंने कुछ पाया है।

Monday, 15 November 2021

श्री विष्णु चालीसा/Shri Vishnu Chalisa

 ।।दोहा।।

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।

कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥


।।चौपाई।।

नमो विष्णु भगवान खरारी,कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत,सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।

तन पर पीताम्बर अति सोहत,बैजन्ती माला मन मोहत ॥

शंख चक्र कर गदा बिराजे,देखत दैत्य असुर दल भाजे ।

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण,कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।

करत अनेक रूप प्रभु धारण,केवल आप भक्ति के कारण ॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,तब तुम रूप राम का धारा ।

भार उतार असुर दल मारा,रावण आदिक को संहारा ॥

आप वाराह रूप बनाया,हरण्याक्ष को मार गिराया ।

धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,चौदह रतनन को निकलाया ॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,रूप मोहनी आप दिखाया ।

देवन को अमृत पान कराया,असुरन को छवि से बहलाया ॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,भस्मासुर को रूप दिखाया ॥

वेदन को जब असुर डुबाया,कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।

मोहित बनकर खलहि नचाया,उसही कर से भस्म कराया ॥

असुर जलन्धर अति बलदाई,शंकर से उन कीन्ह लडाई ।

हार पार शिव सकल बनाई,कीन सती से छल खल जाई ॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,बतलाई सब विपत कहानी ।

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥

देखत तीन दनुज शैतानी,वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,हना असुर उर शिव शैतानी ॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,हिरणाकुश आदिक खल मारे ।

गणिका और अजामिल तारे,बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥

हरहु सकल संताप हमारे,कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥

चहत आपका सेवक दर्शन,करहु दया अपनी मधुसूदन ।

जानूं नहीं योग्य जब पूजन,होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण,विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।

करहुं आपका किस विधि पूजन,कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,कौन भांति मैं करहु समर्पण ।

सुर मुनि करत सदा सेवकाईहर्षित रहत परम गति पाई ॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई,निज जन जान लेव अपनाई ।

पाप दोष संताप नशाओ,भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,निज चरनन का दास बनाओ ।

निगम सदा ये विनय सुनावै,पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥


देवउठनी एकादशी/Dev Uthani Ekadashi

 कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी मनाई जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली के बाद आने वाली एकादशी को पूरे चार महीने बाद भगवान विष्णु जागते हैं इसीलिए इसे देवोत्थान एकादशी कहते हैं

जिन चार महीनों में श्रीहरि सोते हैं उन महीनों में विवाह और उपनयन जैसे कोई भी मंगल कर्म नहीं किए जाते हैं. देवोत्थान एकादशी को तुलसी विवाह भी होता है


पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें वर्णित एकादशी-माहात्म्य के अनुसार श्री हरि-प्रबोधिनी (देवोत्थान) एकादशी का व्रत करने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञों का फल मिलता है। इस परमपुण्यप्रदाएकादशी के विधिवत व्रत से सब पाप भस्म हो जाते हैं तथा व्रती मरणोपरान्त बैकुण्ठ जाता है। इस एकादशी के दिन भक्त श्रद्धा के साथ जो कुछ भी जप-तप, स्नान-दान, होम करते हैं, वह सब अक्षय फलदायक हो जाता है। देवोत्थान एकादशी के दिन व्रतोत्सवकरना प्रत्येक सनातनधर्मी का आध्यात्मिक कर्तव्य है।

देवुत्थान एकादशी के दिन कुछ बातों का ध्यान करके दुखों का नाश किया जा सकता है मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के दुखों का नाश होता है और मृत्यु के बाद उसे बैकुंठ की प्राप्ति होती है. इसके साथ ही, श्री हरि को पीले रंग के फूल और वस्त्र समर्पित करने चाहिए ऐसा करने से श्री हरि विष्णु आपके दुखों को दूर करते हैं और सुख समृद्धि का वर प्रदान करते हैं

Sunday, 13 September 2020

पिता की प्रार्थना

           एक बार पिता और पुत्र जलमार्ग से यात्रा कर रहे थे, और दोनों रास्ता भटक गये। फिर उनकी नौका भी उन्हें ऐसी जगह ले गई, जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई। 

          पिता ने पुत्र से कहा, "अब लगता है, हम दोनों का अंतिम समय आ गया है, दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है।"

          अचानक पिता को एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि "वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है, तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें।" 

          उन्होने दोनों टापू आपस में बाँट लिए। एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

          पुत्र ने ईश्वर से कहा, 'हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।' ईश्वर ने प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया। 

          फिर उसने प्रार्थना की, एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ। तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी। अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे लूँ ? 

          उसने ऐसा ही किया। उसने प्रार्थना की, एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ। तत्काल नाव प्रकट हुई, और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा। तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?

          पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो, प्रार्थना तो उनने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी।  शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना ?

          आकाशवाणी ने कहा, 'क्या तुम्हें पता है, कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?

          पुत्र बोला, नहीं।

          आकाशवाणी बोली तो सुनो, 'तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की, हे भगवन! मेरा बेटा आपसे जो माँगे, उसे दे देना। और जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।'

          हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं। और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर पछताना पड़ता है।


                       मातृपितृ चरणकमलोभ्यः नमः

यह किसी और ने मेरे पास भेजा था।

Thursday, 5 March 2020

अपमान का घाव/ Insult wound



प्राचीन समय की बात है एक ब्राह्मण था। वह अपने जीवन से बड़ा दुखी रहा करता था। घर में कुछ खाने को नहीं था। स्वयं को खाने के लिए कुछ था ही नहीं तो दूसरों को क्या खिलाता? नातेदार-रिश्तेदार भी उसी की इज्जत करते हैं जो व्यक्ति धनवान होता है। इन सब चीजों से दुखी होकर ब्राह्मण ने कहीं दूर भाग जाने या किसी नरभक्षी पशु का आहार बन जाने की सोची। इसी सोच में डूबा हुआ वह घने जंगल की ओर निकल गया।

शाम होने को आई। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसने सोचा कि अभी कोई हिंसक पशु आएगा जो अपनी भूख मिटाने के साथ मेरी जीवन-लीला खत्म करके सारे क्लेश भी दूर कर देगा।

उसी समय उसने देखा कि सामने एक गुफा में से शेर निकला। शेर कुछ रूका। पेड़ पर उसका मंत्री हंस बैठा था जो अपनी बुद्धि, अपने शील-स्वभाव और दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए जग-प्रसिद्ध है।
शेर ने कहा- दीवानजी! आज तो शिकार स्वयं ही सामने आ गया।

हंस ने ब्राह्मण को देखा और सोचने लगा, पता नहीं यह कौन दुखी आदमी है। शेर ने कितने ही जीव मार डाले, आज इस ब्राह्मण को क्यों न बचाऊं? फिर शेर से बोला-मृगराज! यह ब्राह्मण आपका कुल पुरोहित है, आपको ढूंढ़ता-ढूंढ़ता यहां आया है। आपके पूर्वज इनका बड़ा सत्कार करते थे। जाओ, देखते क्या हो, प्रणाम करो। देखना उसे कोई कष्ट न हो। उलटे कुछ संपत्ति दो। क्या याद करेगा कि आपके पास आया था।

शेर भी अपने मंत्री की बात मानता था। झट से गया और ब्राह्मण के पैर छुए और उसे गुफा में ले आया। शेर ने उसकी आवभगत की और फिर एक जगह दिखा दी जहां से ब्राह्मण ने धरती खोदकर दौलत पाई और शेर से अनुमति ले घर लौट आया।

धन-दौलत मिल जाने से ब्राह्मण का दुख-दरिद्र जाता रहा। अब उसका रहन-सहन भी अच्छा हो गया। घर में पशुधन, धन-धान्य आ गया। अब वह प्राय: शेर के पास जाता और हर बार कुछ-न-कुछ ले आता। इस प्रकार वह काफी अमीर हो गया।

एक दिन ब्राह्मण की स्त्री ने कहा-तुम रोज कहते हो कि हमारा नया यजमान बहुत अच्छा है, कभी उसे अपने घर तो बुलाते। इस महीने यजमान गुरु के घर का अन्न खाते हैं, तुम भी उसे निमंत्रण दो। बात ब्राह्मण को जंच गई और वह शेर के पास गया और उसे खाने का न्योता दिया।

शेर ने कहा-रहने दो, हम हुए जंगली जानवर। रात अंधेरे में ही आ सकते हैं। तुम्हें बड़ी असुविधा होगी।

पर ब्राह्मण ने आग्रह किया और शेर ने उसके घर जाना स्वीकार कर लिया। एक दिन ब्राह्मण शेर को अपने साथ ले आया। उसने अपने इस विचित्र यजमान की बड़ी कदर की, पर नई-नई सम्पत्ति पाकर ब्राह्मण की स्त्री को बड़ा गर्व हो गया था। उसने बहुत से पकवान बनाए थे। जब उसने शेर को देखा तो पहले डरी, फिर कुछ घबराई और उसे कुछ सुझाई न दिया कि क्या करे।

ब्राह्मण ने समझाया कि ये कुछ नहीं कहेगा, डरो मत। इसी की कृपा से हमारे दिन फिरे हैं।

जब वे भाजन के लिए बैठे तो ब्राह्मणी ने अपनी नाक कपड़े से बन्द कर ली। उसे शेर से बहुत दुर्गंध आ रही थी। जब खा चुके तो उसने कहा-अच्छा है तुम्हारा यजमान। मुंह से वह दुर्गंध आ रही थी कि मेरी नाक भी सड़ गई। शेर ने यह बात सुन ली और धीरे से जंगल को निकल गया। कुछ दिन बाद ब्राह्मण फिर शेर के पास गया तो देखा, शेर के तेवर बदले हुए थे। शेर ने कहा-पुरोहित जी। यह लो खड्ग और मारो मेरे सिर पर।

ब्राह्मण ने कहा-क्या बात है महाराज। आज आप कैसी बातें कर रहे हैं।
शेर बोला-नहीं, आज तुम्हें खड्ग का वार करना ही पड़ेगा।
ब्राह्मण ने कहा-नहीं, यह काम मुझसे नहीं होगा।
शेर गरजा-देखता हूं तुम कैसे नहीं करोगे।

ब्राह्मण डर गया और उसने खड्ग उठाया और धीरे से शेर के सिर पर लगा दिया। धार तेज थी, कुछ खून बह निकला। ब्राह्मण हैरान हुआ अपने घर लौट आया।

कई दिन बीत गए। ब्राह्मण डर के मारे उधर न जाता। वह समझा कि शेर पागल हो गया है, पता नहीं अब उसका क्या हाल होगा और अगर मैं गया भी तो न मालूम इस बार क्या कहे।

उधर शेर के मंत्री हंस को किसी शिकारी ने मार डाला। शेर ने कौए को नया मंत्री बनाया। कौए ने अपनी मति के अनुसार शेर को सलाह दी और अपने ढंग पर उसे चलाया।

कई महीने बीत गए, ब्राह्मण को फिर धन की आवश्यकता हुई। उसने पुन: शेर के पास जाने की सोची और एक दिन वह जंगल की ओर गया।

शेर की गुफा के बाहर पास के पेड़ पर कौआ बैठा था। उसने जोर से कांव-कांव करना शुरू किया और इस प्रकार शेर को सूचित किया कि शीघ्रता करो, शिकार फंसा है। शेर ने बाहर आकर देखा उसका अपना पुराहित है। उसे हंसी आ गई।
ऐसे ही एक दिन हंस ने भी उसके आने की सूचना दी थी।

ब्राह्मण को शेर के पास बिना संकोच बैठे और बातें करते देख कौए को बड़ा आश्चर्य हुआ, वह तो उसके मारे जाने की ताक में था। शेर ने ताड़ लिया और ब्राह्मण से कहा-देखो भला, मेरे सिर पर जो तुमने प्रहार किया था, उसका क्या हाल है?
ब्राह्मण ने देखा और कहा-महाराज! वह तो अब पूरी तरह भर गया है, अब ठीक है।

शेर ने कहा-खड्ग का घाव ठीक हो गया, परन्तु जो कुछ तुम्हारी पत्नी ने मेरा अपमान किया था, उसका जख्म अभी भी हरा है। वह नहीं भरा।

ब्राह्मण के तो जैसे पांव के नीचे की मिट्टी निकल गई, वह चुप हो गया। शेर ने
कहा-डरो नहीं, असल में यह है:-

हंसा थे सो चल बसे, काग बने दीवान।
जाओ ब्राह्मण घर अपने, शेर किसका यजमान?

पता नहीं यह कौआ क्या पाप करा दे, अब तुम यहां मत आना। ब्राह्मण ने सोचा जान बची लाखों पाए।
फिर उसे आवश्यकता हुई तो भी उसने मुंह उधर न किया।

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Sunday, 29 September 2019

प्रथम देवी शैलपुत्री का महात्म्य और श्लोक



नवरात्रि में दुर्गा पूजा के दौरान सबसे पहले शैलपुत्री की ही उपासना की जाती है। हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण वह शैलपुत्री हुईं। वृषभ शैलपुत्री का वाहन है, इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। शैलपुत्री को प्रथम दुर्गा कहा जाता है और सती के नाम से भी जानी जाती हैं।

उनकी एक मार्मिक कहानी है। एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया पर भगवान शंकर को नहीं। सती यज्ञ में जाने के लिए व्याकुल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो उनके पिता दक्ष ने उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दारुण दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया।


यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शिव से हुआ। इनका महत्व और शक्ति अनंत है। पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं।

मां दुर्गा अपने प्रथम स्वरूप में शैलपुत्री के रूप में जानी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण इन्हें शैल पुत्री कहा गया। भगवती का वाहन बैल है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। अपने पूर्व जन्म में यह सती नाम से प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। नव दुर्गाओं में शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनन्त हैं। नवरात्र के दौरान प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा व उपासना की जाती है। ध्यान

वंदे वांच्छितलाभायाचंद्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढांशूलधरांशैलपुत्रीयशस्विनीम्घ्

पूर्णेदुनिभांगौरी मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा।

पटांबरपरिधानांरत्नकिरीटांनानालंकारभूषिताघ्

प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांतकपोलांतुंग कुचाम्।

कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितंबनीम्घ् स्तोत्र

प्रथम दुर्गा त्वहिभवसागर तारणीम।

धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम

त्रिलोकजननींत्वंहिपरमानंद प्रदीयनाम।

सौभाग्यारोग्यदायनीशैलपुत्रीप्रणमाभ्यहमघ्

चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन।

भुक्ति, मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहमघ्

चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन।

भुक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहमघ् कवच

ओमकार में शिरपातुमूलाधार निवासिनी।

हींकार,पातुललाटेबीजरूपामहेश्वरीघ्

श्रीकाररूपातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी।

हूंकाररूपातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृतघ्

फट्काररूपातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा।

इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है। दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके। उपासना मंत्र

वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम।।

Friday, 2 August 2019

मैं न होता तो क्या होता


अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये। वे सोचने लगे। यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता???

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है,  मै न होता तो क्या होता ? परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है। अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा।

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।

आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...
 मै न होता तो क्या होता