Tuesday, 7 May 2019

भगवान परशुराम जी की जीवनी

www.hindihaat.com से साभार
भगवान परशुराम जी की जीवनी
भगवान परशुराम भारत की ऋषि परम्परा के महान वाहक थे. उनका शस्त्र और शास्त्र दोनों पर समान अधिकार था. वे भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं. उनका प्रभाव त्रेता युग से शुरू होकर द्वापर तक जाता है. उनका जीवन एक आदर्श पुरूष का जीवन था.

भगवान परशुराम का जन्म 

भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका थी. पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म पुत्रेष्ठि यज्ञ के बाद देवराज इंद्र के वरदान के बाद हुआ था. परशुराम जी का जन्म वैशाख शुक्ल की तृतीया को हुआ. इसलिए अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान परशुराम की जयन्ती मनाई जाती है. उनके पितामह भृगु ने उनका नाम अनन्तर राम रखा जो शिव द्वारा दिए गए अस्त्र परशु को धारण करने की वजह से परशुराम हो गया.

परशुराम जीवन परिचय

परशुराम जी शिक्षा-दिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं महर्षि ऋचीक के आश्रम में हुई. महर्षि ऋचीक तो अपने शिष्य की योग्यता से इतने प्रसन्नत हुए कि उन्होंने परशुराम जी को सांरग धनुष उपहार में दिया. उनकी प्रतिभा और दैवीय गुणों से प्रभावित होकर ऋषि कष्यप ने उन्हें अविनाशी वैष्णव मंत्र प्रदान किया. भगवान शंकर की उन्होंने अराधना की और शिव ने उन्हें विद्युदभि नाम का परशु प्रदान किया. भगवान शिव से उन्हें त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्रोत और कल्पतरू मंत्र भी प्राप्त हुआ.

गुरू परशुराम

परशुराम ने जी ने अपनी अद्भुत शस्त्र विद्या से समकालीन कई गुणवान षिष्यों को युद्ध कला में पारंगत किया. उनके सबसे योग्य शिष्य गंगापुत्र भीष्म रहे जिन्हें पूरा भारत आदर की दृष्टि से देखता है. इसके अलावा द्रोण और कर्ण भी  उनके षिष्य थे.
भगवान परशुराम का उल्लेख दोनो महान भारतीय महाकाव्यों रामायण और गीता में मिलता है. तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस में उनके और लक्ष्मण के बीच हुआ संवाद बहुत पठनीय और लोकप्रिय है.
परशुराम जी की पूजा पूरे भारत में होती है. हर वर्ग उनको पूजनीय मानता है. एक मान्यता के अनुसार भारत के ज्यादातर गांव परशुराम जी ने ही बसाए थे. पूरे उत्तर भारत से लेकर गोवा, केरल और तमिलनाडु तक आपको परशुराम जी की प्रतिमा के दर्शन होंगे.

परशुराम जी और क्षत्रियों का विनाश

परशुराम जी ने 21 बार इस पृथ्वी को क्षत्रियों से विहिन किया, ऐसी मान्यता है. इस कथा के अनुसार हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन या कार्तवीयअर्जुन ने घोर तपस्या की और भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर लिया. भगवान दत्तात्रेय ने उसे एक हजार भुजाए और युद्ध में अपराजित होने का वरदान दे दिया.
एक बार राजा सहस्त्रार्जुन वन में आखेट करता हुआ अपनी सेना के साथ ऋषि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा. वहां उसने ऋषि की कामधेनू गाय को देखा तो उसने बलपूर्वक उसे जमदग्नि से छीन ले गया. इस बात का पता जब परशुराम को चला तो उन्होंने सहस्त्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारा और उसकी सभी भुजाओं को अपनी फरसे से काट डाला और उसका वध कर दिया.
सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने इसका प्रतिशोध लेने के लिए परशुराम जी की अनुपस्थिति में महर्षि जमदग्नि के आश्रम पर आक्रमण कर दिया और जमदग्नि की हत्या कर दी. परशुराम जी की माता रेणुका भी अपने पति के साथ सती हो गई.
कुपित परशुराम ने हैहयवंशीय राजा के महिष्मति नगर पर आक्रमण कर सभी क्षत्रियों का विनाश कर दिया. अपने क्रोध को शांत करने के लिए उन्होंने इस पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहिन कर दिया.

भगवान परशुराम जी की कथाएं

परशुराम जी की अनेक कथाएं प्रचलित है. एक कथा के अनुसार उन्होंने भगवान गणेश के साथ भी युद्ध किया और इस घोर युद्ध में उनके फरसे से भगवान गणेष का एक दांत टूट गया और वे एक दंत कहलाए.
राम और परशुराम की कथा रामायण में आती है, जब भगवान राम ने सीता स्वयंवर के दौरान शिव का धनुष भंग किया तब परशुराम जी और लक्ष्मण जी के बीच विवाद हुआ. भगवान राम ने क्षमा याचना और अपने मीठे शब्दों से उनका क्रोध शांत किया. एक कथा के अनुसार भगवान राम को उनका धनुष परशुराम जी ने ही प्रदान किया था।

परशुराम की प्रतिज्ञा

महाभारत में भी परशुराम जी की कथा कई बार आती है, जिनमें से दो कथाएं बहुत प्रसिद्ध है. एक कथा भीष्म के साथ उनके युद्ध की है. परशुराम जी ने राजकुमारी अंबा को न्याय दिलवाने के लिए भीष्म के साथ घोर युद्ध किया लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला और आखिर में वे अंबा को न्याय नहीं दिलवा सके तो उन्होंने शपथ ली कि वे भविष्य में किसी भी क्षत्रिय को युद्ध कला की शिक्षा नहीं देंगे.
महाभारत की दूसरी प्रमुख कथा कर्ण की है. जब कर्ण को उन्होंने अपना शिष्य बनाया और कर्ण की वास्तविकता जानने के बाद उसे श्राप दिया कि जब उसे उनकी शिक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत होगी तभी वह इस शिक्षा को भूल जाएगा।

भगवान परशुराम और कल्कि अवतार

हिंदू पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम जी कलियुग में अवतार लेने वाले कल्कि अवतार के भी गुरू बनेंगे और भगवान विष्णु के दसवें अवतार को युद्ध कौशल की शिक्षा देंगे।

भगवान परशुराम की शिक्षा

भगवान परशुराम को उनकी पितृभक्ति के लिए जाना जाता है. उनकी शिक्षा है कि माता-पिता का आदर सर्वोच्च है.भगवान परशुराम प्रकृति पोषक थे और प्रकृति का किसी भी प्रकार का विरोध करना वे ईष्वर का विरोध मानते थे.महिला का सम्मान एक सद्पुरूष के लिए अनिवार्य गुण मानते थे और इसी वजह से अंबा का सम्मान लौटाने के लिए अपने सबसे प्रिय शिष्य भीष्म के साथ युद्ध किया।

परशुराम के अन्य नाम

परशुराम जी को अन्नतर राम, जमदग्नि के पुत्र होने के कारण जामदग्न्य, गोत्र के कारण भार्गव और ब्राह्णश्रेष्ठ भी कहा जाता है.
परशुराम मंत्र
भगवान परशुराम मंत्र को परशुराम गायत्री मंत्र के नाम से भी जाना जाता है. इस मंत्र का विधिपूर्वक जप करने से मनुष्य को अपने दुखों से छुटकारा मिलता है और कठिनाइयों से लड़ने के लिए साहस का संचार होता है. मंत्र इस प्रकार है—

    ‘ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात्।।’
    ‘ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।।’
    ‘ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम:।।’

Sunday, 28 April 2019

ख्वाहिश नहीं मुझे मशहूर होने की

मुन्सी प्रेमचंद जी की एक सुंदर कविता

ख्वाहिश नहीं मुझे
मशहूर होने की,

        आप मुझे पहचानते हो
        बस इतना ही काफी है.


अच्छे ने अच्छा और
बुरे ने बुरा जाना मुझे,

        क्यों की जिसकी जितनी जरूरत थी
        उसने उतना ही पहचाना मुझे.


जिन्दगी का फलसफा भी
कितना अजीब है,

        शामें कटती नहीं और
        साल गुजरते चले जा रहें है.


एक अजीब सी
दौड है ये जिन्दगी,

        जीत जाओ तो कई
        अपने
अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं.


बैठ जाता हूँ
मिट्टी पे अकसर,

        क्योंकि मुझे अपनी
        औकात अच्छी लगती है.

मैंने समंदर से
सीखा है जीने का सलीका,

        चुपचाप से बहना और
        अपनी मौज मे रेहना.


ऐसा नहीं की मुझमें
कोई ऐब नहीं है,

        पर सच कहता हूँ
        मुझमें कोई फरेब नहीं है.


जल जाते है मेरे अंदाज से
मेरे दुश्मन,

              क्यों की एक मुद्दत से मैंने,
.... न मोहब्बत बदली
      और न दोस्त बदले हैं.


एक घडी खरीदकर
हाथ मे क्या बांध ली

        वक्त पीछे ही
        पड गया मेरे.

सोचा था घर बना कर
बैठुंगा सुकून से,

        पर घर की जरूरतों ने
        मुसाफिर बना डाला मुझे.


सुकून की बात मत कर
ऐ गालिब,

        बचपन वाला इतवार
        अब नहीं आता.


जीवन की भाग दौड मे
क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?

        हँसती-खेलती जिन्दगी भी
        आम हो जाती है.


एक सवेरा था
जब हँसकर उठते थे हम,

        और आज कई बार बिना मुस्कुराये
        ही शाम हो जाती है.


कितने दूर निकल गए
रिश्तों को निभाते निभाते,

        खुद को खो दिया हम ने
        अपनों को पाते पाते.


लोग केहते है
हम मुस्कुराते बहुत है,

        और हम थक गए
        दर्द छुपाते छुपाते.


खुश हूँ और सबको
खुश रखता हूँ,

        लापरवाह हूँ फिर भी
        सब की परवाह करता हूँ.



मालूम है
कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी

        कुछ अनमोल लोगों से
        रिश्ता रखता हूँ।

Friday, 19 April 2019

भगवान श्री राम और श्री हनुमान जी का संवाद


बहुत सुन्दर और ज्ञान वर्धक प्रसंग...

पहली बात: हनुमान जी जब संजीवनी बूटी का पर्वत लेकर लौटते है तो भगवान से कहते है:- ''प्रभु आपने मुझे संजीवनी बूटी लेने नहीं भेजा था, बल्कि मेरा भ्रम दूर करने के लिए भेजा था, और आज मेरा ये भ्रम टूट गया कि मैं ही आपका राम नाम का जप करने वाला सबसे बड़ा भक्त हूँ''।

भगवान बोले:- वो कैसे ...?

हनुमान जी बोले:- वास्तव में मुझसे भी बड़े भक्त तो भरत जी है, मैं जब संजीवनी लेकर लौट रहा था तब मुझे भरत जी ने बाण मारा और मैं गिरा, तो भरत जी ने, न तो संजीवनी मंगाई, न वैध बुलाया।
कितना भरोसा है उन्हें आपके नाम पर, उन्होंने कहा कि यदि मन, वचन और शरीर से श्री राम जी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो, यदि रघुनाथ जी मुझ पर प्रसन्न हो तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित होकर स्वस्थ हो जाए।
उनके इतना कहते ही मैं उठ बैठा।
सच कितना भरोसा है भरत जी को आपके नाम पर।

शिक्षा :-
हम भगवान का नाम तो लेते है पर भरोसा नही करते, भरोसा करते भी है तो अपने पुत्रो एवं धन पर, कि बुढ़ापे में बेटा ही सेवा करेगा, धन ही साथ देगा।
उस समय हम भूल जाते है कि जिस भगवान का नाम हम जप रहे है वे है, पर हम भरोसा नहीं करते।
बेटा सेवा करे न करे पर भरोसा हम उसी पर करते है।

दूसरी बात प्रभु...!

बाण लगते ही मैं गिरा, पर्वत नहीं गिरा, क्योकि पर्वत तो आप उठाये हुए थे और मैं अभिमान कर रहा था कि मैं उठाये हुए हूँ।
मेरा दूसरा अभिमान भी टूट गया।

शिक्षा :-
हमारी भी यही सोच है कि, अपनी गृहस्थी का बोझ को हम ही उठाये हुए है।
जबकि सत्य यह है कि हमारे नहीं रहने पर भी हमारा परिवार चलता ही है।

जीवन के प्रति जिस व्यक्ति कि कम से कम शिकायतें है, वही इस जगत में अधिक से अधिक सुखी है।
 जय श्री सीताराम जय श्री बालाजी



⛳जय श्री राम⛳

Thursday, 18 April 2019

आत्मसुधार का प्रयास


          चाहे गलती स्वयं की हो मगर दूसरों को दोष देना, यही आज के इस आदमी की फितरत बन गयी है। आदमी गिरता है तो पत्थर को दोष देता है, डूबता है तो पानी को दोष देता है और कुछ नहीं कर पाता तो क़िस्मत को दोष देता है।
         दूसरों को दोष देने का अर्थ ही मात्र इतना सा है कि स्वयं की गलती को स्वीकार करने का सामर्थ्य न रख पाना और अपने में सुधार की सारी संभावनाओं को स्वयं अपने हाथों से कुचल देना।
         खुद के जीवन में दोष होने से भी ज्यादा घातक है, दूसरों को दोष देना क्योंकि इसमें समय का अपव्यय व आत्मप्रवंचना दोनों होते हैं। अतः आत्मसुधार का प्रयास करो, जहाँ आत्म सुधार की प्रवत्ति है, वहीँ परमात्मा से मिलन भी है।

         

Wednesday, 17 April 2019

ज़िन्दगी अवसरों से भरी हुई है


एक नौजवान आदमी एक किसान की बेटी से शादी की इच्छा लेकर किसान के पास गया ।

किसान ने उसकी ओर देखा और कहा,
तुम मेरे खेत में जाओ,
मैं एक एक करके तीन बैल
छोड़ने वाला हूँ ।
अगर तुम तीनों बैलों में से किसी भी एक बैल की पूँछ पकड़ लो तो मैं अपनी बेटी की शादी तुमसे कर दूंगा ।

नौजवान खेत में बैल की पूँछ पकड़ने के लिए खडा हो गया ।

किसान ने खेत में स्थित घर का दरवाजा खोला,
और एक बहुत ही बड़ा और खतरनाक बैल उसमे से निकला,
नौजवान ने ऐसा बैल पहले कभी नहीं देखा था,
उससे डर कर नौजवान ने निर्णय लिया कि वह अगले बैल का इंतज़ार करेगा,
और वह एक तरफ हो गया जिससे बैल उसके पास से होकर निकल गया ।

दरवाजा फिर खुला,
आश्चर्यजनक रूप से इस बार पहले से भी बड़ा और भयंकर बैल निकला,
नौजवान ने सोचा कि इससे तो पहला वाला बैल ठीक था फिर उसने एक ओर होकर बैल को निकल जाने दिया ।

दरवाजा तीसरी बार खुला,
नौजवान के चहरे पर मुस्कान आ गई,
इस बार एक छोटा और मरियल बैल निकला,
जैसे ही बैल नौजवान के पास आने लगा, नौजवान ने उसकी पूँछ पकड़ने के लिए मुद्रा बना ली ताकि उसकी पूँछ सही समय पर पकड़ ले पर उस बैल की पूँछ थी ही नहीं ।

कहानी से सीख
ज़िन्दगी अवसरों से भरी हुई है,
कुछ सरल हैं और कुछ कठिन ।

पर अगर एक बार अवसर गवां दिया तो फिर वह मौका दुबारा नहीं मिलेगा ।

अतः हमे हमेशा प्रथम अवसर को ही हासिल करने का प्रयास करना चाहिए ।।

Tuesday, 16 April 2019

आत्मीय एहसास

रामायण कथा का एक अंश

जिससे हमे सीख मिलती है "एहसास" की...

    


*श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता' मैया* चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,

राह बहुत *पथरीली और कंटीली* थी !

की यकायक *श्री राम* के चरणों मे *कांटा* चुभ गया !


श्रीराम *रूष्ट या क्रोधित* नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से *अनुरोध* करने लगे !

बोले- "माँ, मेरी एक *विनम्र प्रार्थना* है आपसे, क्या आप *स्वीकार* करेंगी ?"


*धरती* बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !"


प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप *नरम* हो जाना !

कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना !

मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे *आघात* मत करना"


श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई !

पूछा- "भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है ?

जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ?

फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी *व्याकुलता* क्यों ?"


*श्री राम* बोले- "नही...नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके *हृदय* को विदीर्ण कर देगा !"


*"हृदय विदीर्ण* !! ऐसा क्यों प्रभु ?",

*धरती माँ* जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !


"अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी *कंटीली राह* से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये *शूल* उनके पगों मे भी चुभे होंगे !

मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी *पीड़ा* सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप *कमल पंखुड़ियों सी कोमल* बन जाना..!!"


अर्थात 

*रिश्ते* अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।

जहाँ *गहरी आत्मीयता* नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु *दिखावा* हो सकता है ।


इसीलिए कहा गया है कि...

*रिश्ते*खून से नहीं, *परिवार* से नही,

*मित्रता* से नही, *व्यवहार* से नही,

बल्कि...

सिर्फ और सिर्फ आत्मीय एहसास से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं।

जहाँ एहसास ही नहीं, 

आत्मीयता ही नहीं ..

वहाँ अपनापन कहाँ से आएगा l

          

हम सबके लिए प्रेरणास्पद लघुकथा

Wednesday, 6 February 2019

माँ सीता की रसोई और हनुमान जी का भोजन



घटना उस समय की है जब श्री राम और देवी सीता वनवास की अवधि पूरी करके अयोध्या लौट चुके हैं। अन्य सब लोग तो श्री राम के राज्याभिषेक के उपरांत अपने अपने राज्यों को लौट गए, किंतु हनुमान जी ने श्री राम के चरणों में रहने को ही जीवन का लक्ष्य माना।

एक दिन देवी सीता के मन में आया कि हनुमान ने लंका में आकर मुझे खोज निकाला और फिर युद्ध में भी श्री राम को अनुपम सहायता की, अब भी अपने घर से दूर रह कर हमारी सेवा करते हैं, तो मुझे भी उनके सम्मान में कुछ करना चाहिए। यह विचार कर उन्होंने हनुमान को अपनी रसोई से भोजन के लिए आमंत्रित कर डाला माँ स्वयं पका कर खिलाएँगी आज अपने पुत्र हनुमान को।

सुबह से माता रसोई में व्यस्त हैं हर प्रकार से हनुमान जी की पसंद के भोजन पकाए जा रहे हैं। एक थाल में मोतीचूर के लड्डू सजे हैं, तो दुसरे में जलेबियाँ पूड़ी और कचोरी और बूंदी भी पकाए जा रहे हैं आज किसी को भोजन की आज्ञा नहीं जब तक कि हनुमान न खा लें प्रभु राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सभी प्रतीक्षा में हैं कि कब हनुमान भोजन के लिए आयें और कब हमारी भी पेट पूजा हो।

दोपहर हुई और  निमंत्रण के समय अनुसार पवनपुत्र का आगमन हुआ बड़े शौक से आ कर माता की चरण वन्दना की और अनुमति पाकर आसन पर विराजे माँ परोसने लगी और पुत्र खाने लगा। लायो माता लायो पूड़ी दो, कचोरी दो, लड्डू दो हनुमान मांग मांग कर खा रहे हैं और माता रीझ कर खिला रही हैं थाल के थाल सफाचट होते जा रहे हैं पर हनुमान की तृप्ति नहीं हुई माता ने जितना पकाया था सब समाप्त, किंतु अभी पेट कहाँ भरा लल्ला का?

माता सीता पुनः भागी रसोई की ओर, पुनः चूल्हा जलाया, पकाना आरम्भ किया, उधर हनुमान पुकार रहे हैं, माता बहुत स्वादिष्ट भोजन है, और दीजिये, अभी पेट नहीं भरा माता पकाती जा रही हैं, हनुमान खाते जा रहे हैं भण्डार का सारा अन्न समाप्त माता पर धर्मसंकट आन पडा है, क्या करें? भागी गयीं श्री राम प्रभु से सहायता की गुहार करने प्रभु आप ही कुछ कीजिये, और भंडार का प्रबंध कीजिये, ये हनुमान तो सब चट किये जा रहा है।

श्री राम सुन कर हंस दीये, बोले, सीते, तुमने मेरे भक्त को अब तक नहीं पहचाना उसका पेट इन सबसे नहीं भरने वाला, उसे कुछ और चाहिए देवी ने पूछा, क्या है वो वस्तु जो मेरे हनुमान लल्ला को तृप्ति देगी? रामजी बोले चलो मेरे संग, मंदिर में ले गए, वहां तुलसी माँ विराजित है एक पत्ता हाथ में लिया, आँख बंद करके उसमें अपने स्नेह, अपने आशीष, अपनी कृपा का समावेश किया, और देवी को पकड़ा दिया, जायो देवी अपने पुत्र को संतुष्ट करो।

माता भी समझ चुकी अब तो अपने पुत्र की इच्छा को सौम्य मुस्कान लिए लौटीं रसोई की ओर, बोलीं, पुत्र हाथ बढायो और वो ग्रहण करो जिसकी इच्छा मन में लिए तुम मेरा पूरा भण्डार निपटा गए हनुमान जी ने हाथ बढाया और अभिमंत्रित तुलसीदल ग्रहण किया मुंह में रखते ही चित्त प्रसन्न, और आत्मा तृप्त आसन से उठ खड़े हुए, बोले माँ, आनंद आ गया आपने पहले ही दे दिया होता तो इतना परिश्रम न करना पड़ता आपको।

माता हंस पडी, बोलीं, पुत्र तुम्हारी महिमा केवल तुम्हारे प्रभु जानते हैं वो भगवान् और तुम उनके भक्त, मैं माता तो बीच में यूं ही आ गयी हनुमान ने चरणों में प्रणाम किया, बोले, माँ आप बीच में हो तो ही प्रसाद मिला है आज मुझे, आपके श्री कर से माता के नयनों में आनंद के अश्रु चमक आये, और मुख से अपार आशीष अपने हनुमान लल्ला के लिए।

जय श्री राम