Friday, 10 August 2018

श्री विष्णु चालिसा/ Shri Vishnu Chalisa

||दोहा||
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय।

कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय॥



||चौपाई||
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी।

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत।

तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत॥

शंख चक्र कर गदा बिराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे।

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन दनुज असुर दुष्टन दल गंजन।

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण।

करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा।

भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा॥

आप वाराह रूप बनाया, हरण्याक्ष को मार गिराया।

धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया।

देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया।

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया॥

वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया॥



असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लडाई।

हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी।

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥

देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे, हिरणाकुश आदिक खल मारे।

गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥

हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे।

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥

चहत आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन।

जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण।

करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण॥

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण।

सुर मुनि करत सदा सेवकाई हर्षित रहत परम गति पाई॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई।

पाप दोष संताप नशाओ, भव बन्धन से मुक्त कराओ॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ, निज चरनन का दास बनाओ।

निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥




Thursday, 9 August 2018

शादी एक ऐसा दिन है/ Shadi Ek Aisa Din Hai

शादी एक ऐसा दिन है
जब लड़का स्टेज पर अपनी दुल्हन के साथ बैठे हुए दूसरी लड़कियों को देखकर सोचता है…
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“ये सब आज से पहले कहाँ मर गई थी।”!!

Thoughts Of The Day/ आज के विचार


केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।
-विदुर नीति

श्री लक्ष्मी चालीसा/ Shri Laxmi Chalisa

दोहा
मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥
सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।
ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥

सोरठा

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

चौपाई
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥
जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥
तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥
ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥
त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥
जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥
ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥
भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥
रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥

दोहा 
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥

इति लक्ष्मी चालीसा संपूर्णम

Wednesday, 8 August 2018

Thoughts Of The Day/ आज के विचार



शुद्ध जल से तन और आत्म ज्ञान से मन पवित्र होता है।
- अरविंद बाबा

Tuesday, 7 August 2018

Thoughts Of The Day/ आज के विचार

कष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ गुण हैं। जो साहस के साथ उनका सामना करते हैं, वे विजयी होते हैं। 
लोकमान्य तिलक




Poorness and misery are the best qualities of education to humans. Those who face them with courage, they are victorious. - Lokmanya Tilak


श्री गणेश चालीसा/ Shri Ganesh Chalisa


दोहा

जय गणपति सदगुण सदन,
कविवर बदन कृपाल,
विघ्न हरण मंगल करन,
जय जय गिरिजालाल

चौपाई 

जय जय जय गणपति गणराजू,
मंगल भरण करण शुभः काजू,
जय गजबदन सदन सुखदाता,
विश्व विनायका बुद्धि विधाता

वक्रतुंडा शुची शुन्दा सुहावना,
तिलका त्रिपुन्दा भाल मन भावन,
राजता मणि मुक्ताना उर माला,
स्वर्ण मुकुता शिरा नयन विशाला

पुस्तक पानी कुथार त्रिशूलं,
मोदक भोग सुगन्धित फूलं,
सुन्दर पीताम्बर तन साजित,
चरण पादुका मुनि मन राजित

धनि शिव सुवन शादानना भ्राता,
गौरी लालन विश्व-विख्याता,
रिद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे,
मूषका वाहन सोहत द्वारे

कहूं जन्मा शुभ कथा तुम्हारी,
अति शुची पावन मंगलकारी,
एक समय गिरिराज कुमारी,
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा,
तब पहुँच्यो तुम धरी द्विजा रूपा,
अतिथि जानी के गौरी सुखारी,
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी

अति प्रसन्ना हवाई तुम वरा दीन्हा,
मातु पुत्र हित जो टाप कीन्हा,
मिलही पुत्र तुही, बुद्धि विशाला,
बिना गर्भा धारण यही काला

गणनायक गुण ज्ञान निधाना,
पूजित प्रथम रूप भगवाना,
असा कही अंतर्ध्याना रूप हवाई,
पालना पर बालक स्वरूप हवाई

बनिशिशुरुदंजबहितुम थाना,
लखी मुख सुख नहीं गौरी समाना,
सकल मगन सुखा मंगल गावहीं,
नाभा ते सुरन सुमन वर्शावाहीं

शम्भू उमा बहुदान लुतावाहीं,
सुरा मुनिजन सुत देखन आवहिं,
लखी अति आनंद मंगल साजा,
देखन भी आए शनि राजा

निज अवगुण गाणी शनि मन माहीं,
बालक देखन चाहत नाहीं,
गिरिजा कछु मन भेद बढायो,
उत्सव मोरा शनि तुही भायो

कहना लगे शनि मन सकुचाई,
का करिहौ शिशु मोहि दिखायी,
नहीं विश्वास उमा उर भयू,
शनि सों बालक देखन कह्यौ

पदताहीं शनि द्रिगाकोना प्रकाशा,
बालक सिरा उडी गयो आकाशा,
गिरजा गिरी विकला हवाई धरणी,
सो दुख दशा गयो नहीं वरनी


हाहाकार मच्यो कैलाशा,
शनि कीन्हों लखी सुत को नाशा,
तुरत गरुडा चढी विष्णु सिधाए,
काटी चक्र सो गजशिरा लाये

बालक के धड़ ऊपर धारयो,
प्राण मंत्र पढ़ी शंकर दारयो,
नामगणेशाशम्भुताबकीन्हे,
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा,
पृथ्वी कर प्रदक्षिना लीन्हा,
चले शदानना भरमि भुलाई,
रचे बैठी तुम बुद्धि उपाई

चरण मातु-पितु के धारा लीन्हें,
तिनके सात प्रदक्षिना कीन्हें
धनि गणेशा कही शिव हिये हरष्यो,
नाभा ते सुरन सुमन बहु बरसे

तुम्हारी महिमा बुद्धि बढाई,
शेष सहसा मुख सके गई,
मैं मति हीन मलीना दुखारी,
करहूँ कौन विधि विनय तुम्हारी

भजतारामसुन्दरप्रभुदासा,
जगा प्रयागा ककरा दुर्वासा,
अब प्रभु दया दीना पर कीजै,
अपनी भक्ति शक्ति कुछा दीजै

ll दोहा ll


श्री गणेशा यह चालीसा, पाठा करे धर ध्याना l
नीता नव मंगल ग्रह बसे, लहे जगत सनमाना ll
सम्बन्ध अपना सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेशा l
पूर्ण चालीसा भयो, मंगला मूर्ती गणेशा ll